मैं मलंग इक झोला लटकाए
चलूँ इधर -उधर
न कोई मंजिल
न ही कोई एक रास्ता
जहाँ चाहूं वहां बना लूं
अपना छोटा सा इक घर
मैं मलंग इक झोला लटकाए
चलूँ इधर -उधर
कभी मिलूँ गले से
रेत के ठन्डे टीलों से
कभी लटकूँ मैं
भीड़ भरी सरकारी बस पर
कभी लूं भीड़ मैं अपनी आखें मीच
कभी लूं हर पल को मैं मन में सींच
मैं मलंग इक झोला लटकाए
चलूँ इधर -उधर
पता नहीं मंजिल
की तलाश फिर क्यों है मुझे
क्या दो 'मैं ' बसते हैं मुझमे ?
हर चेहरे पर मुझे तेरी ही परछाई
क्यों दिखती है ?
पता नहीं क्यों यह टीस
मिटती नहीं है ?
सभी तो है मलंग
सभी को है
इक मंजिल की तलाश
सभी लिए है इक झोला
अपनी अपनी यादों का
इक पोटली अपने कुछ
खूबसूरत झूठे वादों का
मैं मलंग इक झोला लटकाए
चलूँ इधर -उधर
life is like this only n we are here as guest who will walk away after a pause
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